विश्लेषण: 1861 के ढांचे पर टिकी पुलिस में सुधार क्यों अटका, Supreme Court के 2006 के निर्देशों पर अब भी बहस
पूर्व DGP Prakash Singh ने फिर पुलिस सुधार की मांग उठाई है। 2006 के Supreme Court निर्देशों के 20 साल बाद भी राज्यों के अमल पर सवाल हैं। सुधार के पक्ष और सरकारों की चिंताओं, दोनों को समझना जरूरी है।

पुलिस सुधार की बहस फिर चर्चा में
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026: भारत में पुलिस सुधार का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व पुलिस महानिदेशक Prakash Singh ने Hindustan Times में प्रकाशित लेख में तर्क दिया है कि देश की पुलिस अब भी काफी हद तक औपनिवेशिक दौर के Police Act, 1861 की सोच पर चल रही है और उसे राजनीतिक दबाव से मुक्त करने की जरूरत है।
यह बहस नई नहीं है, लेकिन Supreme Court के ऐतिहासिक फैसले के 20 साल पूरे होने के बीच इसका महत्व बढ़ गया है।
इतिहास: आयोग बने, सिफारिशें अधूरी रहीं
Prakash Singh के लेख के अनुसार 1903 में Fraser Commission ने ही पुलिस में "radical reforms" की जरूरत बताई थी। आपातकाल के बाद 1977 के Shah Commission ने पुलिस के दुरुपयोग पर टिप्पणी की और व्यवस्था में बदलाव की सिफारिश की।
1977 में गठित National Police Commission ने आठ खंडों में विस्तृत रिपोर्ट दी, लेकिन लेखक के मुताबिक उसकी सिफारिशों पर सरकारों ने केवल सतही अमल किया।
सुधार के पक्ष में तर्क
सुधार समर्थकों का कहना है कि पुलिस की जवाबदेही केवल कानून के प्रति होनी चाहिए, न कि सत्ता में बैठे दल के प्रति। लेख में बताया गया है कि 18 राज्यों ने Supreme Court के निर्देशों के अनुरूप कानून बनाने का दावा किया है, लेकिन लेखक के अनुसार इनमें से कई कानून फैसले की भावना से मेल नहीं खाते।
लेखक आर्थिक पहलू भी गिनाते हैं। उनके अनुसार World Justice Project के Rule of Law Index में भारत 143 देशों में 86वें स्थान पर है और Institute for Economics & Peace के आकलन के मुताबिक 2023 में आंतरिक अशांति की लागत करीब 1.23 trillion डॉलर रही।
"पुलिस की प्रतिबद्धता, निष्ठा और जवाबदेही केवल कानून के शासन के प्रति होनी चाहिए" — Supreme Court, 2006 के फैसले में
सरकारों और दूसरे पक्ष की दलीलें
दूसरी ओर, संविधान में पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य सूची का विषय है। कई राज्य सरकारें मानती रही हैं कि चुनी हुई सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, इसलिए पुलिस पर उसका प्रशासनिक नियंत्रण लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। उनकी चिंता यह भी रही है कि अत्यधिक स्वायत्तता से पुलिस की जवाबदेही कमजोर हो सकती है।
कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि केवल ढांचागत बदलाव काफी नहीं; खाली पद, प्रशिक्षण, संसाधन और फॉरेंसिक क्षमता जैसे मुद्दे भी उतने ही अहम हैं। इसलिए सुधार की बहस को सिर्फ नियंत्रण बनाम स्वायत्तता तक सीमित नहीं किया जा सकता।
संतुलन कहां है?
दोनों पक्षों के बीच साझा जमीन यही है कि पुलिस को रोजमर्रा के कामकाज और जांच में पेशेवर स्वतंत्रता मिले, जबकि नीति और निगरानी का अधिकार लोकतांत्रिक संस्थाओं के पास रहे। Supreme Court के निर्देश भी इसी संतुलन की बात करते हैं, जैसे कार्यकाल की स्थिरता, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण और जांच व कानून-व्यवस्था के कार्यों का अलगाव।
आगे क्या
पुलिस सुधार पर कोई भी ठोस बदलाव राज्यों की इच्छाशक्ति और केंद्र-राज्य सहमति पर निर्भर करेगा। Viksit Bharat के लक्ष्य के बीच यह सवाल अहम बना रहेगा कि क्या सरकारें औपनिवेशिक ढांचे से आगे बढ़कर जवाबदेह और पेशेवर पुलिस व्यवस्था के लिए कदम उठाती हैं।
(यह विश्लेषण विभिन्न पक्षों के तर्कों को सामने रखने के उद्देश्य से लिखा गया है।)
Frequently asked questions
पुलिस सुधार पर Supreme Court ने कब निर्देश दिए थे?
Supreme Court ने 2006 में पुलिस सुधार पर सात निर्देश दिए थे, जिनमें छह राज्यों और एक केंद्र सरकार के लिए थे।
Police Act, 1861 क्यों चर्चा में है?
आलोचकों का कहना है कि पुलिस का मौजूदा ढांचा अब भी औपनिवेशिक दौर के इसी कानून की सोच पर आधारित है।
कितने राज्यों ने पुलिस कानून बनाए हैं?
Prakash Singh के लेख के अनुसार 18 राज्यों ने निर्देशों के अनुरूप कानून बनाने का दावा किया है, हालांकि उन पर सवाल उठे हैं।
सरकारों की मुख्य दलील क्या है?
पुलिस राज्य सूची का विषय है और चुनी हुई सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, इसलिए प्रशासनिक नियंत्रण जरूरी माना जाता है।
इस बहस का संतुलित रास्ता क्या हो सकता है?
जांच और रोजमर्रा के कामकाज में पेशेवर स्वतंत्रता, और नीति व निगरानी में लोकतांत्रिक नियंत्रण।
Sources
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