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छठ पूजा का इतिहास: वैदिक सूर्य उपासना से लोकआस्था के महापर्व तक, रामायण-महाभारत की कथाएं, छठी मैया कौन हैं और बिहार से दुनिया तक कैसे पहुंचा छठ

छठ की शुरुआत का कोई निश्चित साल या एक संस्थापक नहीं है। ऋग्वेद की सूर्य उपासना, राम-सीता, कर्ण और द्रौपदी की कथाएं, राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी, देव सूर्य मंदिर, मिथिला-भोजपुर के लोकगीत, चार दिन के अनुष्ठान और गिरमिटिया देशों तक इसका सफर, जानिए छठ पूजा का पूरा इतिहास। 2026 में छठ 13 से 16 नवंबर तक है।

संध्या अर्घ्य के समय सूप में प्रसाद लेकर पानी में खड़ी व्रती। (सांकेतिक तस्वीर)

आस्था, अनुशासन और प्रकृति का महापर्व

पटना, 17 अक्टूबर 2026: दिवाली की रौनक खत्म होते ही बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाकों में एक अलग ही तैयारी शुरू हो जाती है। घरों की सफाई होती है, गेहूं धोकर धूप में सुखाया जाता है, बाजारों में बांस के सूप और दउरा सजने लगते हैं और गलियों में शारदा सिन्हा के छठ गीत गूंजने लगते हैं। यह तैयारी है छठ महापर्व की, जिसे लोग प्यार से सिर्फ "छठ" या "छठ पूजा" कहते हैं।

छठ भारत की उन गिनी-चुनी परंपराओं में से है, जिनमें प्रकृति, आस्था, परिवार, अनुशासन और सामुदायिक जीवन एक साथ दिखाई देते हैं। आज यह पर्व सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। Delhi, Mumbai, Kolkata, Surat और Bengaluru से लेकर Mauritius, Fiji, America और Britain तक बसे भारतीय इसे पूरे उत्साह से मनाते हैं।

छठ पूजा में श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं, छठी मैया की आराधना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की मंगलकामना और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं।

लेकिन छठ की शुरुआत कब हुई? क्या इसका संबंध वैदिक काल से है? रामायण और महाभारत में इसकी क्या कथाएं हैं? छठी मैया कौन हैं? और बिहार की यह परंपरा देश-दुनिया तक कैसे पहुंची? इन सवालों का जवाब समझने के लिए धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन सूर्य उपासना, लोककथाओं और ऐतिहासिक प्रमाणों को अलग-अलग देखना होगा।

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2026 में छठ पूजा कब है

इस साल दिवाली 8 नवंबर को है और उसके छह दिन बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी पर छठ का मुख्य दिन पड़ेगा। पंचांग के अनुसार चार दिनों का क्रम इस प्रकार है:

दिनअनुष्ठानतारीख
पहलानहाय-खायशुक्रवार, 13 नवंबर 2026
दूसराखरनाशनिवार, 14 नवंबर 2026
तीसरासंध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को)रविवार, 15 नवंबर 2026
चौथाउषा अर्घ्य और पारणसोमवार, 16 नवंबर 2026

सूर्यास्त और सूर्योदय का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अर्घ्य का सही समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग से जरूर देख लें।

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1. छठ पूजा क्या है और इसका नाम कैसे पड़ा?

छठ को छठ महापर्व, सूर्य षष्ठी, डाला छठ और कुछ इलाकों में छठी के नाम से भी जाना जाता है। "छठ" शब्द संस्कृत के "षष्ठी" से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है छठा दिन। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी इस पर्व का मुख्य दिन है। इसी दिन शाम को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और अगले दिन सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा होता है।

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छठ साल में दो बार आता है:

  • कार्तिक छठ: दिवाली के बाद मनाया जाने वाला सबसे बड़ा और लोकप्रिय छठ।
  • चैती छठ: चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी पर, यानी मार्च-अप्रैल में। इसे कम लोग मनाते हैं, लेकिन नियम उतने ही कड़े होते हैं।

इस पर्व की सबसे अलग पहचान यह है कि इसमें डूबते और उगते, दोनों सूर्य की पूजा होती है। यह जीवन के बदलते चरणों, प्रकृति के चक्र और कृतज्ञता के भाव को दिखाता है।

2. छठ की शुरुआत कब हुई? इतिहास क्या कहता है?

सबसे सीधा जवाब यह है कि छठ की शुरुआत का कोई निश्चित साल, कोई एक संस्थापक या ऐसा कोई एक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं मिलता, जिससे इसके जन्म की सटीक तारीख बताई जा सके। फिर भी इसके इतिहास को तीन आधारों पर समझा जा सकता है।

पहला आधार: प्राचीन भारत में सूर्य उपासना

प्राचीन भारतीय परंपराओं में सूर्य को जीवन, प्रकाश, ऊर्जा और जगत की व्यवस्था से जोड़ा गया। ऋग्वेद में सूर्य, सविता और उषा की स्तुतियां हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र भी सविता, यानी सूर्य के तेज की उपासना है। खेती पर टिके समाज के लिए सूर्य और जल का महत्व स्वाभाविक था, क्योंकि फसल, दिन-रात का चक्र और ऋतुओं का बदलाव सीधे इन्हीं से जुड़ा था।

एक जरूरी फर्क: वैदिक साहित्य में सूर्य पूजा के प्रमाण मिलना और आज का चार दिन का छठ उसी रूप में वैदिक काल से चला आना, ये दो अलग-अलग दावे हैं। मौजूदा छठ के सारे अनुष्ठान उसी काल में थे, यह साबित करने के लिए पर्याप्त सीधे प्रमाण नहीं हैं।

दूसरा आधार: गंगा के मैदान की लोकपरंपराएं

छठ का सांस्कृतिक केंद्र बिहार और आसपास का गंगा का मैदान रहा है। पूजा में इस्तेमाल होने वाली चीजें, जैसे बांस का सूप-दउरा, मिट्टी का चूल्हा, मौसमी फल, चावल और गन्ना, सीधे यहां के खेत-खलिहान और ग्रामीण जीवन से आती हैं। शोधकर्ता इन परंपराओं और पुराने कृषि समाजों के रिश्ते पर विचार करते रहे हैं, लेकिन सिर्फ इन समानताओं से किसी एक प्रागैतिहासिक काल से छठ की सीधी निरंतरता साबित नहीं होती।

तीसरा आधार: पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा

छठ का इतिहास सिर्फ ग्रंथों में नहीं, लोकगीतों, घर-परिवार में सुनाई जाने वाली कथाओं और व्रत के नियमों में भी जिंदा है। कई परिवारों में छठ की तैयारी पूरे खानदान और मोहल्ले की साझा जिम्मेदारी होती है। इसलिए छठ के इतिहास में लिखित ग्रंथों के साथ लोकस्मृति को भी उतना ही महत्व देना जरूरी है।

3. वैदिक काल की सूर्य पूजा और छठ का रिश्ता

ऋग्वेद भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने उपलब्ध धार्मिक ग्रंथों में से एक है। वैदिक विचार में सूर्य प्रकाश, जीवन, समय और प्रकृति के क्रम का प्रतीक है, जबकि उषा भोर और नए दिन के आगमन की देवी हैं। छठ के आखिरी दिन उगते सूर्य को दिया जाने वाला उषा अर्घ्य नाम से ही इस प्राचीन विचार की याद दिलाता है।

क्या ऋग्वेद में आज के छठ का वर्णन है? ऋग्वेद में सूर्य उपासना जरूर है, लेकिन नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य वाले चार दिन के पूरे अनुष्ठान का साफ और पूरा विवरण वहां मिलता है, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा। ज्यादा सटीक बात यह है कि छठ भारत की प्राचीन सूर्य उपासना की परंपरा से जुड़ा है, जबकि इसका आज का क्षेत्रीय रूप लोकपरंपराओं में धीरे-धीरे विकसित हुआ।

अर्घ्य का अर्थ

अर्घ्य यानी श्रद्धा से जल अर्पित करना। छठ में व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य की दिशा में अर्घ्य देते हैं। इसके कई अर्थ माने जाते हैं:

  • जीवन देने वाली प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।
  • परिवार और संतान के कल्याण की प्रार्थना।
  • आत्मसंयम और अनुशासन का अभ्यास।
  • प्रकाश, ऊर्जा और जीवन के प्रति सम्मान।

4. भारत के सूर्य मंदिर और बिहार का देव सूर्य मंदिर

भारत में सूर्य उपासना की परंपरा पत्थरों में भी दर्ज है। Odisha का कोणार्क सूर्य मंदिर (13वीं सदी, UNESCO विश्व धरोहर), Gujarat का मोढेरा सूर्य मंदिर (11वीं सदी) और Kashmir का मार्तंड सूर्य मंदिर इसके बड़े उदाहरण हैं।

बिहार में छठ से सबसे गहराई से जुड़ा नाम है औरंगाबाद जिले का देव सूर्य मंदिर। यह मंदिर पश्चिम की ओर मुख वाला होने के लिए जाना जाता है, जबकि ज्यादातर सूर्य मंदिर पूर्वमुखी होते हैं। छठ के दौरान यहां के सूर्यकुंड पर लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं और राज्य सरकार यहां हर साल देव छठ मेला लगाती है। मंदिर के निर्माण काल को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, इसलिए इसकी सटीक तारीख पर विद्वान एकमत नहीं हैं। पटना जिले का उलार और नालंदा का बड़गांव भी छठ के पुराने सूर्य धाम माने जाते हैं।

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5. रामायण से जुड़ी छठ की कथा

छठ से जुड़ी एक लोकप्रिय मान्यता भगवान राम और माता सीता की है। लोककथाओं के कुछ रूपों में बताया जाता है कि लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर, दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को राम और सीता ने व्रत रखकर सूर्य की उपासना की। बिहार के मुंगेर में यह मान्यता खास तौर पर प्रचलित है कि माता सीता ने वहां गंगा किनारे छठ व्रत किया था और वहां का सीताचरण मंदिर इसी आस्था से जुड़ा है।

इस कथा में सूर्य उपासना विजय के बाद कृतज्ञता, राजधर्म और परिवार के कल्याण की कामना से जुड़ती है। माता सीता का नाम आने से परिवार के लिए किए जाने वाले व्रत में महिलाओं की भूमिका को भी महत्व मिलता है।

लेकिन रामायण के अलग-अलग संस्करणों और क्षेत्रीय परंपराओं में घटनाओं के विवरण अलग हैं। राम और सीता ने आज के छठ के सारे अनुष्ठान किए, यह सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। इसे छठ से जुड़ी प्रचलित धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखना उचित है।

6. महाभारत: सूर्यपुत्र कर्ण की कथा

छठ से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोकमान्यताओं में से एक कर्ण की है। महाभारत की परंपरा के अनुसार कर्ण सूर्य देव और कुंती के पुत्र थे और उन्हें सूर्य से दिव्य कवच और कुंडल मिले थे। उन्हें दानवीर, साहसी और सूर्य का अनन्य भक्त माना जाता है।

लोकप्रिय छठ कथाओं में यह विश्वास है कि कर्ण रोज घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। बिहार के भागलपुर-मुंगेर इलाके को प्राचीन अंग देश माना जाता है, जिसके राजा कर्ण थे, इसलिए यहां कर्ण और छठ का रिश्ता लोकस्मृति में और गहरा है। कर्ण की कथा छठ के कई मूल्यों से मेल खाती है:

  • नियमितता: हर दिन सूर्य को प्रणाम का भाव।
  • दान और उदारता: कर्ण की पहचान ही दानवीर की है।
  • समर्पण: कठिन हालात में भी कर्तव्य से न डिगना।
  • प्रकृति के प्रति श्रद्धा: सूर्य को जीवन और ऊर्जा का स्रोत मानना।

फिर भी यह कहना कि महाभारत के उपलब्ध पाठों में आज के चार दिन के छठ की स्थापना का साफ वर्णन है, ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।

7. द्रौपदी और पांडवों से जुड़ी कथा

एक और लोकप्रिय कथा द्रौपदी और पांडवों की है। क्षेत्रीय कथाओं के अनुसार वनवास के कठिन दिनों में द्रौपदी ने परिवार की रक्षा और संकट दूर होने की कामना से सूर्य की उपासना की। कुछ कथाओं में ऋषि धौम्य के मार्गदर्शन का भी जिक्र आता है। महाभारत की परंपरा में युधिष्ठिर को सूर्य से अक्षय पात्र मिलने की कथा भी सूर्य उपासना से ही जुड़ी है, जिससे वनवास में किसी को भूखा नहीं लौटना पड़ा।

इस कथा का संदेश यह है कि संकट के समय श्रद्धा, धैर्य और अनुशासन के सहारे इंसान उम्मीद बनाए रखता है। लेकिन छठ की उत्पत्ति के लिए कोई एक सर्वमान्य पौराणिक कथा नहीं है और अलग-अलग इलाकों में सुनाई जाने वाली कथाओं में अंतर मिलता है।

8. छठी मैया कौन हैं?

छठ में सूर्य देव के साथ छठी मैया की आराधना होती है। बिहार और आसपास की लोकआस्था में छठी मैया संतान की रक्षा, बच्चों के स्वास्थ्य और परिवार के कल्याण की देवी हैं। कई जगह उन्हें सूर्य देव की बहन भी कहा जाता है।

छठी मैया और षष्ठी देवी

हिंदू परंपराओं में षष्ठी देवी का संबंध बच्चों के जन्म, उनकी रक्षा और संतान की मंगलकामना से है। उत्तर भारत में बच्चे के जन्म के छठे दिन होने वाली "छठी" की रस्म भी इसी देवी-परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। छठ में पूजी जाने वाली छठी मैया को कई क्षेत्रीय परंपराओं में इसी परंपरा से जोड़ा जाता है, हालांकि उनकी पहचान और सूर्य देव से उनके रिश्ते की व्याख्याएं अलग-अलग हैं।

राजा प्रियव्रत की कथा

पुराणों से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी की है। कथा के अनुसार निःसंतान राजा ने ऋषि कश्यप की सलाह पर यज्ञ कराया। संतान तो हुई, लेकिन शिशु मृत पैदा हुआ। शोक में डूबे राजा के सामने देवी षष्ठी प्रकट हुईं, उन्होंने शिशु को जीवन दिया और संतान की मंगलकामना के लिए अपनी उपासना का महत्व बताया। कथा के कुछ रूपों में देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है।

यह एक धार्मिक कथा है, प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं। लेकिन इसमें माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति चिंता और परिवार के सुखी भविष्य की प्रार्थना का वही भाव है, जो आज भी छठ के केंद्र में है।

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9. बिहार, मिथिला, मगध और भोजपुर में छठ का विकास

छठ के इतिहास में बिहार के मगध, मिथिला, भोजपुर और अंग क्षेत्रों का खास महत्व है। यहां यह पर्व पूजा-पाठ से आगे बढ़कर लोकगीतों, पारिवारिक परंपराओं, खेती-किसानी और सामुदायिक सहयोग का हिस्सा बना।

ग्रामीण जीवन से जुड़ाव

पारंपरिक गांव में नदी, तालाब, खेत और सूर्य रोजमर्रा की जिंदगी के केंद्र थे। कार्तिक का महीना धान की नई फसल और गन्ने की कटाई का भी समय होता है, इसलिए छठ में चढ़ने वाले फल, गन्ना, नया चावल और दूसरी मौसमी चीजें सीधे कृषि और स्थानीय खान-पान से जुड़ी हैं। हालांकि यह एक ऐतिहासिक व्याख्या है। सिर्फ खेती से संबंध के आधार पर छठ की उत्पत्ति किसी खास समुदाय से निश्चित रूप से नहीं जोड़ी जा सकती।

छठ के लोकगीत: आस्था का जीवित इतिहास

मिथिला और भोजपुर में छठ के गीत इस पर्व की आत्मा हैं। महिलाएं प्रसाद बनाते हुए और घाट जाते हुए ये गीत गाती हैं। "कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए" और "उग हो सुरुज देव, भइल अरघ के बेर" जैसे गीत पीढ़ियों से गाए जा रहे हैं। इन गीतों में सूर्य देव, छठी मैया, संतान, मायका, ससुराल और जीवन की कठिनाइयों का जिक्र आता है। इस तरह लोकगीत आस्था के साथ समाज के इतिहास के भी वाहक बन जाते हैं।

बिहार की लोकगायिका शारदा सिन्हा ने इन गीतों को रेडियो, कैसेट और फिर इंटरनेट के जरिए दुनिया भर में पहुंचाया। उन्हें "बिहार कोकिला" कहा जाता है। 5 नवंबर 2024 को छठ के दौरान ही उनका निधन हुआ और 2025 में उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। आज भी छठ का माहौल उनके गीतों के बिना अधूरा माना जाता है।

मगध और भोजपुर

मगध और भोजपुर में छठ घाट, सामूहिक पूजा, स्थानीय बोलियों के गीत और प्रसाद की परंपराएं इसकी क्षेत्रीय पहचान हैं। समय के साथ अलग-अलग जिलों और समुदायों में रीति-रिवाजों में कुछ अंतर भी विकसित हुए। इसलिए छठ को किसी एक जगह किसी एक व्यक्ति का शुरू किया त्योहार मानने के बजाय, एक लंबी क्षेत्रीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझना ज्यादा सही है।

10. चार दिन का अनुष्ठान: कब, क्या और क्यों

छठ की आज की पहचान इसके चार दिन के क्रम से बनती है और हर दिन का अलग महत्व है।

पहला दिन: नहाय-खाय

व्रती नदी या घर पर स्नान करके शुद्धता के साथ पूजा शुरू करते हैं। घर की पूरी सफाई होती है और भोजन सेंधा नमक तथा शुद्ध घी में, तय पारंपरिक नियमों से बनता है। बिहार के ज्यादातर घरों में इस दिन कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल खाने की परंपरा है, इसलिए कई जगह इसे "कद्दू-भात" भी कहते हैं।

दूसरा दिन: खरना

व्रती दिन भर उपवास रखते हैं और शाम को पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ी से गुड़ की खीर (रसियाव), घी लगी रोटी और केला का प्रसाद बनता है। खरना का प्रसाद लेने के बाद ज्यादातर व्रती करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू करते हैं, जो उषा अर्घ्य के बाद पारण तक चलता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य

यह छठ का सबसे भव्य दृश्य है। शाम को व्रती और उनके परिवार नदी, तालाब या किसी जलाशय के किनारे जुटते हैं। बांस के सूप और दउरा में फल, गन्ना, ठेकुआ, नारियल, दीया और पूजा की दूसरी सामग्री रखी जाती है। परिवार के पुरुष अक्सर दउरा सिर पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं। सूर्यास्त के समय व्रती पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। कई परिवारों में रात को घर के आंगन या छत पर कोसी भराई की रस्म भी होती है, जिसमें गन्नों से मंडप बनाकर दीये जलाए जाते हैं।

चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण

अगली सुबह सूर्योदय से पहले व्रती फिर घाट पहुंचते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतान के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद व्रत का पारण होता है और प्रसाद रिश्तेदारों, पड़ोसियों और घाट पर मौजूद लोगों में बांटा जाता है। छठ में प्रसाद मांगकर लेना भी शुभ माना जाता है।

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11. डूबते और उगते, दोनों सूर्य की पूजा क्यों?

दुनिया की कई सभ्यताओं में सूर्य की पूजा होती रही है, लेकिन डूबते सूर्य को पूरे विधि-विधान से अर्घ्य देना छठ की खास पहचान है। इसके कई सांस्कृतिक और धार्मिक अर्थ बताए जाते हैं:

  • कृतज्ञता: दिन भर रोशनी और ऊर्जा देने वाले सूर्य को शाम को धन्यवाद।
  • आशा: सुबह उगता सूर्य नए दिन, नई शुरुआत और जीवन की निरंतरता का प्रतीक।
  • संतुलन: सूर्यास्त और सूर्योदय जीवन के उतार-चढ़ाव और प्रकृति के नियमित चक्र को स्वीकार करने का भाव।
  • प्रत्यक्ष देवता: छठ में पूजा का केंद्र आंखों के सामने मौजूद सूर्य है, इसलिए इसे "प्रत्यक्ष देव" की पूजा भी कहा जाता है।
एक लोकप्रिय कहावत छठ के इसी भाव को बताती है: दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, लेकिन छठ में डूबते सूरज को भी उतने ही सम्मान से अर्घ्य दिया जाता है।

ये अर्थ धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याएं हैं। छठ में सूर्यास्त की पूजा कब और क्यों शुरू हुई, इस पर कोई एक निर्णायक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है।

12. सूप, ठेकुआ, गन्ना और फल क्यों खास हैं?

छठ की पहचान उसके प्रसाद और पूजा सामग्री से भी होती है, जिनमें स्थानीय खेती, शिल्प और घरेलू परंपराओं की छाप है।

  • बांस का सूप और दउरा: पूजा सामग्री रखने और घाट तक ले जाने के लिए। इन्हें बनाने वाले स्थानीय कारीगरों के लिए छठ साल का सबसे बड़ा कारोबारी मौसम होता है।
  • ठेकुआ: गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी और घी से बनने वाला पारंपरिक प्रसाद। इसे लकड़ी के सांचे से आकार दिया जाता है और यह कई दिनों तक खराब नहीं होता। ठेकुआ आज बिहार की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
  • गन्ना, केला, नारियल और मौसमी फल: डाभ नींबू, सिंघाड़ा, सुथनी, अदरक और हल्दी के पौधे जैसी चीजें भी चढ़ती हैं, जो इस मौसम की उपज हैं।
  • मिट्टी के चूल्हे और बर्तन: कई परिवार छठ के लिए अलग मिट्टी का चूल्हा और बर्तन इस्तेमाल करते हैं और प्रसाद बनाते समय साफ-सफाई के कड़े नियम मानते हैं।

इन चीजों की मौजूदा परंपरा को किसी एक प्राचीन घटना से जोड़ने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं, लेकिन ये छठ के स्थानीय जीवन, शिल्प और खान-पान से गहरे जुड़ाव को साफ दिखाती हैं।

13. छठ में पुरोहित और मूर्ति जरूरी क्यों नहीं?

छठ की एक अनोखी बात यह है कि इसका मुख्य अनुष्ठान खुले आसमान के नीचे, नदी या तालाब के किनारे होता है। व्रती सीधे सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

  • सूर्य को अर्घ्य देने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं।
  • मुख्य अनुष्ठान में मूर्ति स्थापना आवश्यक नहीं होती।
  • पूजा के प्रमुख अनुष्ठान व्रती खुद करते हैं, किसी पुरोहित की अनिवार्यता नहीं है।
  • घाट की सफाई, सजावट और व्यवस्था में पूरा परिवार और मोहल्ला मिलकर हाथ बंटाता है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर परिवार में हर विधि एक जैसी होती है। कुछ परिवार अपनी स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अतिरिक्त अनुष्ठान भी करते हैं। लेकिन घाट पर अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों का एक साथ खड़ा होना छठ को सच्चे अर्थों में लोकपर्व बनाता है।

14. बिहार से पूरे भारत और दुनिया तक

छठ का पारंपरिक केंद्र बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश रहा है। झारखंड और नेपाल के तराई इलाकों, जैसे जनकपुर और बीरगंज, में भी इसकी गहरी जड़ें हैं।

प्रवास ने फैलाया छठ

बीसवीं सदी में रोजगार, पढ़ाई और कारोबार के लिए बिहार और पूर्वी UP से बड़ी संख्या में लोग Delhi, Mumbai, Kolkata और दूसरे शहरों में बसे। वे अपने साथ छठ की परंपरा भी ले गए। शुरुआत में परिवार घर पर या आसपास के तालाबों में पूजा करते थे, फिर धीरे-धीरे शहरों में सामूहिक आयोजन, अस्थायी घाट और सरकारी इंतजाम होने लगे। आज छठ पर बिहार लौटने वालों की भीड़ इतनी होती है कि रेलवे को हर साल हजारों अतिरिक्त ट्रेन फेरे चलाने पड़ते हैं।

Delhi और Mumbai में छठ

Delhi में यमुना के किनारे और शहर भर में बने सैकड़ों घाटों पर श्रद्धालु जुटते हैं और Delhi सरकार पिछले कई सालों से छठ पर सार्वजनिक छुट्टी घोषित करती रही है। Mumbai में Juhu beach पर उमड़ने वाली भीड़ बताती है कि यह क्षेत्रीय परंपरा कैसे महानगरों की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई है।

विदेशों में छठ

करीब डेढ़ सौ साल पहले गिरमिटिया मजदूर बनकर Mauritius, Fiji, Suriname और Trinidad गए भोजपुरी समाज के लोगों ने भी अपनी परंपराएं संजोकर रखीं। आज America, Britain, Gulf देशों और Australia में बसे बिहार और पूर्वी UP के लोग झील, समुद्र तट या तय जलाशयों पर छठ मनाते हैं।

15. छठ और महिलाओं की भूमिका

छठ में महिलाओं की भूमिका सबसे ज्यादा दिखाई देती है। कई परिवारों में महिलाएं व्रत रखती हैं, प्रसाद बनाती हैं और अनुष्ठानों का नेतृत्व करती हैं। इस परंपरा के तीन सामाजिक पहलू खास हैं:

  • पारिवारिक जिम्मेदारी: व्रती परिवार के स्वास्थ्य, बच्चों की मंगलकामना और घर की सुख-समृद्धि के लिए पूजा करते हैं।
  • पीढ़ियों के बीच विरासत: लोकगीत, प्रसाद की विधि और व्रत के नियम बड़े-बुजुर्गों से नई पीढ़ी तक पहुंचते हैं।
  • सामुदायिक सहयोग: फल, सूप, प्रसाद और दूसरी सामग्री का इंतजाम परिवार और समाज मिलकर करते हैं।

लेकिन छठ सिर्फ महिलाओं का पर्व नहीं है। बड़ी संख्या में पुरुष भी व्रत रखते हैं और हर परिवार अपनी परंपरा के अनुसार जिम्मेदारियां बांटता है।

16. सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व

छठ नदी, तालाब और जलाशयों के बिना अधूरा है, इसलिए यह पर्व आस्था के साथ पर्यावरण और सार्वजनिक स्वच्छता के सवाल भी सामने लाता है। घाटों की सफाई, रोशनी, रास्तों का इंतजाम और प्रसाद बांटने जैसे काम पूरे समाज को एक साथ लाते हैं।

आज के समय में छठ मनाते हुए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है:

  • पूजा सामग्री और plastic कचरा पानी में न फेंकें।
  • नदी और तालाबों में प्रदूषण न बढ़ने दें।
  • गहरे पानी में न जाएं और घाट पर लगे सुरक्षा निर्देश मानें, खासकर बाढ़ के बाद जिन नदियों में पानी का स्तर ऊंचा है।
  • बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांग श्रद्धालुओं की जरूरतों का ख्याल रखें।

ध्यान रहे, सिर्फ धार्मिक आयोजन होने से कोई जलाशय अपने आप साफ नहीं हो जाता। इसके लिए नियमित सफाई, प्रदूषण पर रोक और सामुदायिक जिम्मेदारी जरूरी है।

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17. छठ का आध्यात्मिक संदेश

छठ को सिर्फ एक धार्मिक आयोजन मानना इसके बड़े सांस्कृतिक अर्थ को छोटा कर देगा। इसमें कुछ ऐसे मूल्य हैं, जो इसकी लोकप्रियता और निरंतरता को समझाते हैं:

  • प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: सूर्य और जल को जीवन का आधार मानकर उनका आभार।
  • परिवार के कल्याण की कामना: संतान, परिवार और प्रियजनों के स्वास्थ्य और सुख की प्रार्थना।
  • अनुशासन और समर्पण: कड़े नियमों का पालन और पूजा की तैयारी में धैर्य।
  • सामूहिक भागीदारी: परिवार, पड़ोस और समाज का एक साथ आना।

स्वास्थ्य का ध्यान: छठ का 36 घंटे का निर्जला व्रत कठिन होता है। परंपरा का सम्मान करते हुए व्रती अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और diabetes, BP या किसी दूसरी बीमारी से जूझ रहे लोग व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

18. छठ का इतिहास: एक नजर में

काल या चरणऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
प्राचीन वैदिक परंपराएंसूर्य, सविता और उषा की उपासना के प्रमाण
प्राचीन कृषि-आधारित समाजसूर्य, जल, खेती और मौसमी चक्रों का जीवन में महत्व
रामायण और महाभारत से जुड़ी लोकमान्यताएंराम-सीता, कर्ण और द्रौपदी की कथाओं से सूर्य उपासना की व्याख्या
मध्यकाल के सूर्य मंदिरमोढेरा, कोणार्क और बिहार के देव जैसे सूर्य धाम
बिहार और आसपास की क्षेत्रीय परंपराएंचार दिन के अनुष्ठान, लोकगीत, प्रसाद और सामुदायिक भागीदारी का विकास
बीसवीं सदी का प्रवासमहानगरों और गिरमिटिया देशों में सामूहिक छठ आयोजनों का विस्तार
वर्तमान समयभारत के अलग-अलग राज्यों और दुनिया भर में बसे भारतीयों के बीच व्यापक आयोजन

यह समयरेखा छठ से जुड़े धार्मिक और सामाजिक विकास की एक मोटी रूपरेखा है। शुरुआती चरणों की सटीक तारीखें और आज के अनुष्ठानों के विकास का पूरा क्रम निश्चित रूप से स्थापित नहीं है।

निष्कर्ष: छठ सिर्फ त्योहार नहीं, एक जीवित परंपरा

छठ के इतिहास को समझने के लिए किसी एक पौराणिक कथा को जानना काफी नहीं है। इसका रिश्ता प्राचीन भारतीय सूर्य उपासना, क्षेत्रीय लोकविश्वासों, खेती-किसानी, पारिवारिक परंपराओं और सामुदायिक सहयोग से है। ऋग्वेद में सूर्य उपासना के प्रमाण मिलते हैं, रामायण, महाभारत और लोककथाएं छठ को धार्मिक अर्थ देती हैं, बिहार, मिथिला, मगध और भोजपुर में इसने अपनी अलग पहचान बनाई और प्रवास के साथ यह देश-दुनिया तक पहुंचा।

लेकिन इसके इतिहास की ईमानदार समझ यह भी मानती है कि छठ की सटीक शुरुआत का साल ज्ञात नहीं है और आज के सारे अनुष्ठानों को किसी एक प्राचीन ग्रंथ या घटना से सीधे जोड़ना संभव नहीं है।

छठ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसमें श्रद्धा मंदिर की चारदीवारी में बंद नहीं रहती। व्रती खुले आसमान के नीचे, पानी में खड़े होकर, डूबते और उगते सूर्य के सामने प्रकृति, परिवार और जीवन के प्रति अपनी कृतज्ञता जताते हैं। यही परंपरा इसे बिहार की सांस्कृतिक पहचान और करोड़ों लोगों की गहरी आस्था का महापर्व बनाती है।

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Photos

घाट पर सजी छठ की पूजा सामग्री: बांस के सूप-दउरा में ठेकुआ, फल, गन्ना और दीये। (सांकेतिक तस्वीर)
घाट पर सजी छठ की पूजा सामग्री: बांस के सूप-दउरा में ठेकुआ, फल, गन्ना और दीये। (सांकेतिक तस्वीर)
संध्या अर्घ्य के समय नदी में खड़ी व्रती और किनारे जलते दीये। (सांकेतिक तस्वीर)
संध्या अर्घ्य के समय नदी में खड़ी व्रती और किनारे जलते दीये। (सांकेतिक तस्वीर)
उषा अर्घ्य के लिए भोर में घाट पर जुटे श्रद्धालु। (सांकेतिक तस्वीर)
उषा अर्घ्य के लिए भोर में घाट पर जुटे श्रद्धालु। (सांकेतिक तस्वीर)
घाट पर रखे सूप, जिनमें केला, नारियल, गन्ना, सुथनी और दूसरे मौसमी फल सजे हैं। (सांकेतिक तस्वीर)
घाट पर रखे सूप, जिनमें केला, नारियल, गन्ना, सुथनी और दूसरे मौसमी फल सजे हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

Frequently asked questions

छठ पूजा की शुरुआत कब हुई?

छठ की शुरुआत का कोई निश्चित साल, संस्थापक या एक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं मिलता। इसका संबंध प्राचीन वैदिक सूर्य उपासना से है, जबकि आज का चार दिन का रूप बिहार और आसपास की लोकपरंपराओं में धीरे-धीरे विकसित हुआ।

2026 में छठ पूजा कब है?

2026 में छठ 13 नवंबर (नहाय-खाय) से शुरू होगा। 14 नवंबर को खरना, 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य के साथ व्रत का पारण होगा।

छठी मैया कौन हैं?

लोकआस्था में छठी मैया संतान की रक्षा और परिवार के कल्याण की देवी हैं। कई परंपराएं उन्हें षष्ठी देवी से जोड़ती हैं और कई जगह उन्हें सूर्य देव की बहन भी कहा जाता है।

छठ में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

डूबते सूर्य को अर्घ्य दिन भर रोशनी और ऊर्जा देने के लिए कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है, जबकि उगते सूर्य का अर्घ्य नई शुरुआत और आशा का। ये धार्मिक-सांस्कृतिक व्याख्याएं हैं।

छठ का निर्जला व्रत कितने घंटे का होता है?

खरना का प्रसाद लेने के बाद ज्यादातर व्रती करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं, जो उषा अर्घ्य के बाद पारण तक चलता है। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार लोग व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह लें।

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